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ज्वालामुखी क्या है, उसके प्रकार एवं विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी
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ज्वालामुखी क्या है 

ज्वालामुखी एक छिद्र होता है, जिससे होकर पृथ्वी के अत्यंत तप्त गर्म लावा, गैस, जल एवं चट्टानों के टुकड़ों से युक्त पदार्थ पृथ्वी के धरातल पर प्रकट होते है, जबकि ज्वालामुखीयता (volcanism ) में पृथ्वी के आतंरिक भाग में मैग्मा गैस के उत्पन्न होने से लेकर भूपटल के नीचे ऊपर लावा प्रकट होने तथा उसके शीतल ठोस होने की समस्त प्रक्रियाएँ शामिल की जाती है !

ज्वालामुखी के रूप है :-  आभ्यांतरिक (intrusive ) और बाह्रा (extrusive ) :-

1 ) आभ्यांतरिक क्रिया :- में पिघला पदार्थ (लावा ) धरातल के नीचे ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, जिनमें बैथोलिन, लैकोलिथ, सिल तथा डाइक का प्रमुख है !

2 ) बाह्रा क्रिया :- में धरातलीय प्रवाह के रूप में लावा का जमकर ठोस रूप लेना, गर्म जल के झरने और गेसर का उत्पन्न होना प्रमुख है !

► ज्वालामुखी उद्गार के कारण :- 

ज्वालामुखी उद्गार के प्रमुख कारण निम्नलिखित है :-

1)प्लेट टेक्टोनिक्स

 विनाशी प्लेट किनारों के सहारे विस्फोटक प्रकार के ज्वालामुखी का उद्गार होता है ! जब दो प्लेट आमने -सामने सरकती है, तो उनके आपसी टक्कर के कारण कम घनत्व वाली प्लेट नीचे चली जाती है और 100 किमी की गहराई में पहुंचर पिघल जाती है एवं केंद्रीय उदभेदन के रूप में प्रकट होती है ! ऐसी ज्वालामुखी क्रिया परिशान्त मेखला में घटित होती है !

2) रचनात्मक प्लेट किनारों

 रचनात्मक प्लेट किनारों के सहारे ज्वालामुखी क्रिया होती है ! यहाँ महासागरीय कटक के सहारे दो प्लेट विपरीत दिशों में अग्रसर होती है जिससे दाबमुक्ति के कारण मेन्टल का भाग पिघलकर दरारि उदभेदन के रूपों में प्रकट होती है !

3) कमजोर भूपटल का होना

ज्वालामुखी उद्गार के लिए कमजोर भू-भागों का होना अति आवश्यक है ! ज्वालामुखी का लावा कमजोर भी भागों को ही तोड़कर धरातल पर आता है ! प्रशांत महासागरों के तटीय भाग, पश्चिमी द्वीप समूह और एण्डीज पर्वत क्षेत्र ज्वालामुखी इसका प्रमाण है !

4) भू -गर्भ अत्यधिक तापमान का होना

यह उच्च तापमान वहाँ पर पाए जाने वाले रेडियोधर्मी (redioctive ) पदार्थों के विघटन, रासायनिक प्रकमों (chemical processes ) तथा ऊपरी दबाव के कारण होता है ! इस प्रकार अधिक गहराई पर पदार्थ पिघल जाता है, और भू तल कमजोर भागों को तोड़कर बाहर निकल आता है !

5 )गैसों की उत्पत्ति

गैसों में जलवाष्प सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ! वर्षा का जल भू -तल की दरारों तथा रन्ध्रों द्वारा पृथ्वी की आन्तरिक भागों में पहुँच जाता है ! और वहाँ पर अधिक तापमान के कारण जलवाष्प में परिवर्तित हो जाता है ! समुद्र तट के निकट समुद्री जल भी रिसकर नीचे ओर चला जाता है ! और जलवाष्प बन जाता है ! जब जल से जलवाष्प बनता है, तो उसका आयतन तथा दबाव बहुत बढ़ जाता है ! अतः वह भू-तल पर कोई कमजोर स्थान पाकर विस्फोट के साथ बाहर निकल आता है !

ज्वालामुखी के प्रकार

► ज्वालामुखी के प्रमुख तीन प्रकार के होते है :-

1 )शान्त ज्वालामुखी

इस प्रकार के ज्वालामुखी में विस्फोट प्रायः बंद हो जाते है और भविष्य में कोई विस्फोट होने की संभावना नहीं होती ! इसका मुख मिटटी लावा आदि पदार्थों से बंद हो जाता है और मुख का गहरा क्षेत्र कालांतर में झील के रूप में बदल जाता है, जिसके ऊपर पेड़ - पौधे उग आते है ! म्यांमार का पोपा ज्वालामुखी इसका प्रमुख उदहारण है

2 )प्रसुप्त ज्वालामुखी

इस प्रकार के ज्वालामुखी में दीर्घकाल से उदभेदन (विस्फोट ) नहीं हुआ होता, किन्तु इसकी सम्भावनाएँ बनी रहती है ! ये जब कभी अचानक क्रियाशील हो जाते है, तो जन-धन की अपार क्षति होती है ! इसकी मुख गैसे तथा वाष्प निकली करती है ! इटली का विसुवियस ज्वालामुखी कई वर्ष तक प्रसुप्त रहने के पश्चात् वर्ष 1931 में अचानक फुट पड़ा!

3 ) सक्रिय ज्वालामुखी

इस प्रकार के ज्वालामुखी में प्रायः विस्फोट तथा उदभेदन होता ही रहता है ! ! इनका मुख सर्वदा खुला रहता है ! और समय -समय पर लावा, धुआँ तथा अन्य पदार्थ बाहर निकलते रहते है, जिससे शंकु का निर्माण होता रहता है  ! इटली में पाए जाने वाला एट्ना ज्वालामुखी इसका प्रमुख उदहारण है, जोकि 2500 वर्षों से सक्रिय है ! सिसली द्वीप का स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी प्रत्येक 15 मिनट बाद फटता है ! इसे भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है !

ज्वालस्थलाकृतियाँ

बाह्य स्थलाकृतियाँ

1 ) राख अथवा सिण्डर शंकु (Ash or cinder cone ) :- ज्वालामुखी निकास से बाहर हवा में उड़ा में हुआ लावा शीघ्र ही ठंडा होकर ठोस टुकड़ों में परिवर्तित हो जाता है, जिसे सिण्डर कहते है ! विस्फोटीय ज्वालामुखी द्वारा जमा की गई राख तथा अंगारों से बनने वामी शंक्वाकार (conical ) की आकृति को सिण्डर शंकु कहते है ! सिण्डर शंकु हवाई द्वीप में अधिक पाए जाते है !    

2) मिश्रित शंकु (composite cone ) :- ये सबसे ऊँचे और बड़े शंकु होते है, इनका निर्माण लावा, राख तथा अन्य ज्वालामुखी पदार्थों के बारी - बारी से जमा होने से होता है ! यह जमाव समान्तर परतों से होता है ! इसकी ढलानों पर अन्य कई छोटे -छोटे शंकु बन जाते  है, जिन्हे परजीवी शंकु (parasite cone ) कहते है ! जापान का फ्युजियमा, संयुक्त राज्य अमेरिका का शास्ता, रेनियर और हुड, फिलीपाइन का मेयर अलास्का का एजकॉम्ब तथा इटली का स्ट्राम्बोली मिश्रित शंकु के मुख्य उदहारण है !

3 ) शंकुस्थ शंकु (cone in cone ) :- इन शंकुओं को घोसला शंकु (nested cone ) भी कहा जाता है ! प्रायः एक  शंकु के अंदर ही एक अन्य शंकु बन जाता है ! ऐसे शंकुओं में विसुवियस का शंकु सबसे प्रसिध्द उदहारण है !

4 ) क्षारीय लावा शंकु अथवा लावा शील्ड (basic lava cone lava shield ) :- पैठिक लावा में सिलका की मात्रा कम होती है और यह अम्ल की अपेक्षा अधिक तरल तथा पतला होता है ! यह दूर -दूर तक फ़ैल जाता है ! और कम ऊंचाई तथा मंद ढाल वाले शंकु का निर्माण करता है ! हवाई द्वीप का मोनलोआ शंकु इसका उत्तम उदहारण है !

5 ) अम्ल लावा शंकु अथवा गुम्बद (acid lava cone or dome ) :- इसका निर्माण अम्ल लावा से होता है ! इस लावा में सिलका की मात्रा अधिक होती है, अतः यह काफी गाढ़ा तथा चिपचिपा होता है ! यह ज्वालामुखी से निकलने के तुरंत बाद उसके मुख के आस -पास जम जाता है ! और तीव्र ढाल वाले गुम्बद का निर्माण कर देता है ! इटली में स्ट्राम्बोल तथा फ्रांस में पाई डी डोम (puy de dome ) इसके अच्छे उदहारण है !

6 )लावा पठार (lava plateau ) :- ज्वालामुखी विस्फोट से लावा निकलने पर विस्तृत पठारों का निर्माण होता है ! भारत का दक्कन पठार इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ! संयुक्त अमेरिका का कोलंबिया पठार इसका एक और महत्वपूर्ण उदहारण है !

7 ) ज्वालामुखी पर्वत (volcanic mountain ) :- जब ज्वालामुखी उदगार से शंकु बहुत बड़े आकर के हो जाते है, तो ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है ! इस प्रकार के पर्वत इटली, जापान तथा अलास्का में पाए जाते है ! जापान का फ्युजियमा सबसे महत्वपूर्ण ज्वालामुखी पर्वत है !

अन्तर्वेधी स्थलाकृतियाँ

1 ) बैथोलिथ :- ये भू पर्पटी में अत्यधिक गहराई पर  निर्मित होता है ! एवं अनाच्छादन की प्रक्रिया के द्वारा भूपटल पर प्रकट होता है ! ये ग्रेफाइट के बने पिण्ड है ! मुख्यतः यह मैग्मा भंडार  के जमे हुए भाग है !

2 ) लैकोलिथ :- ये गुम्बदनुमा विशाल अन्तर्वेधी चट्टान है ! जिसका तल समतल एक पाइपरूपी लावा वाहक नली से  जुड़ा होता है ! ऐसी आकृति कर्णाटक के पठार में मिलता है ! इनमें  अधिकतर चट्टानें अपत्रित हो चुकी है !

3) डाइक :- इसका निर्माण तब होता है ! जब लावा का प्रवाह दरारों में धरातल के समकोण पर होता है ! यह दीवार की भाँति संरचना बनाता है ! पश्चिमी महाराष्ट्र क्षेत्र में इसके उदहारण मिलते है ! दक्कन ट्रेप के विकास में भी डाइक की भूमिका मानी जाती है !

4 ) सिल, लैपोलिथ एवं फैकोलिथ :- मैग्मा जब चट्टानों के बीच में क्षैतिज तल में चादर के रूप में ठंडा होता है, तो यह सिल कहलाता है ! कम मोटाई वाले जमाव को सहित कहते है ! यदि मैग्मा या लावा तश्तरी की तरह जम जाए, तो लैपोलिथ कहलाता है, परन्तु जब चट्टानों की मोड़दार अवस्था में अपनती के ऊपर या अभिनति के तल में लावा का जमाव हो तो फैकोलिथ कहलाता है !

विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी

नाम

देश

ओजोस डेल सलाडो

अर्जेंटीना -चिली

कोटोपैक्सी

इक्वेडोर

मोनोलोआ

हाबाईद्वीप

माउंट कैमरून

कैमरून (अफ्रीका )

माउंट ऐरेबस

रॉस(अंटार्कटिका)

माउंट हेकला

आइसलैंड

विसुवियस

नेपल्स की खारी(इटली )

स्ट्राम्बोली

लेपारी द्वीप

क्राकातोआ

इंडोनेसिया

चिम्बोरोजो

इक्वेडोर

फ्युजियमा

जापान

माउंट ताल

फिलीपींस

माउंट लाकी

आइसलैंड

देमबंद

ईरान

कोहसुल्तान

ईरान

माउंट एल्बुर्ज

जार्जिया

किलिमंजारो

तंजानिया

माउंट कीनिया

कीनिया

माउंट मेयोन

फिलीपींस

सेंटहेलेना

अमेरिका

 

 


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